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कुंवारी नौकरानी की चूत के मजे लूटे

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मैं लखनऊ की रहने वाली हूं। मैंने अपनी पढ़ाई लखनऊ से ही पूरी की थी। मैं यहां अपने मम्मी पापा के साथ रहती थी। पढ़ाई पूरी होने के बाद मुझे तुरंत ही पुणे से जॉब का ऑफर आ गया था। मैं पुणे जाना चाहती थी। लेकिन मेरे घर वालों को मेरी बहुत चिंता सता रही थी। कि मैं वहां अकेले कैसे रह पाऊंगी। पर मैंने अपने घरवालों को समझाया और कुछ दिन बाद मैं पुणे चली गई। वहां मैं अकेली रहती थी। मेरा ऑफिस मेरे फ्लैट से ज्यादा दूर नहीं था। मैं अकेली जाती और अकेली ही आती थी। फिर ऑफिस में मेरे कुछ नए दोस्त बने।


एक दिन मैं ऑफिस से घर जा रही थी तभी अचानक विवेक मुझे मिला। मैं उसे देख कर बहुत खुश हुई।  हम दोनों स्कूल से लेकर कॉलेज तक दोनों साथ ही पढ़ते थे। वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त था। एक दिन वह पुणे आया पर उसे रहने की अच्छी जगह नहीं मिल रही थी तो मैंने उसे तब तक अपने ही साथ रहने को कहा। जैसे ही उसे नौकरी मिलती वह अपने लिए दूसरा फ्लैट देख लेता। लेकिन तब तक वह मेरे साथ मेरे फ्लैट में रहता था। यह बात मैंने अपने घरवालों को नहीं बताई थी। हम दोनों पहले से ही एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। तो मुझे उसके यहां रहने से कोई दिक्कत नहीं थी।


मैं सुबह अपने ऑफिस जाती और शाम को घर आती तब तक विवेक घर पर ही रहता। कभी वह जॉब की इंटरव्यू के लिए जाता इधर उधर भटकता फिरता रहता था। हम दोनों साथ में ही रहने लगे थे। कुछ दिन बाद उसे भी अच्छी जॉब मिल गई। हम दोनों साथ में ही घर से निकलते और साथ ही घर वापस आते हैं। हम दोनों मिलकर घर का काम करते थे। साथ रहते रहते हमें एक दूसरे की आदत हो गई थी। अब हम एक दूसरे के बिना नहीं रह पाते थे। हम दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। जब भी हमें समय मिलता हम दोनों आपस में घूमने जाया करते दोनों समय बिताते।


एक दिन विवेक ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगा तुम्हें मुझे देखकर कुछ लगता नहीं है क्या मैंने उसे कहा लगना क्या है इसमें। हम दोनों एक साथ रहते हैं इसमें कुछ समस्या वाली बात नहीं है। तो वह कहने लगा मेरी और भी जरूरत है क्या तुम पूरी करोगी। मैंने कहा ऐसी कौन सी जरूरत है तुम्हारी जो मैं पूरी नहीं कर पा रही हूं। मैं उसके मन में क्या है वह तो समझ चुकी थी। पर उस समय मैंने कुछ नहीं कहा फिर मैं नहाने चली गई। वह बाहर मेरा इंतजार कर रहा था। जैसे ही मैं नहा कर आई मैंने टॉवल अपने शरीर को लपेटा हुआ था। मेरे गीले बाल थे। उसने मुझे ऐसे ही अपनी बाहों में समा लिया और कहने लगा। अब तो तुम मेरी जरूरतों को समझ लो। उसके यह कहते ही मेरा टावल नीचे गिर गया। मेरी पैंटी ब्रा उसने देख ली।


मैं उसके सामने ऐसी खड़ी रही मुझे पहले अच्छा महसूस नहीं हो रहा था। उसने कहा  कोई बात नहीं और यह कहते हुए उसने मुझे अपने गले लगा लिया। अब उसने मेरी लाल पैंटी में हाथ डाला और मेरी योनि को दबाने लगा। मैंने आज ही अपने चूत से बाल साफ किए थे। तो वह एकदम  चिकनी हो रखी थी। जिसको देखकर वह कहने लगा। तुम्हारे तो एक भी बाल नहीं है। यह सुनकर में हंस पडी। हंसते-हंसते उसने मेरी चूत इतनी जोर से दबा दिया कि मेरे मुंह से आवाज निकल पड़ी। और मैं उसे कहने लगी। इतनी जोर से क्यों दबा रहे हो आराम से भी तो कर सकते हो। अब यह कहते हुए मैंने उसे  गले लगा लिया।


मैंने उसके होठों को अपने होठों से मिलाते हुए किस करना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे मैं किस करती जाती। वह मेरी तरफ आता जाता मैंने उसको बहुत तेजी से किस करना शुरू किया। वह मुझसे कहने लगा तुम तो बड़े अच्छे से किस करते हो। मेरे से भी नहीं रहा जा रहा था। मैंने जैसे ही उसकी पेंट  मैं हाथ लगाया तो उसका लंड खड़ा हो रखा था। यह देख कर मैं थोड़ा हिचकिचाने लगी। पर मैंने उसकी जीप खोल कर उसके लंड को बाहर निकाल लिया और उसको अपने मुंह में ले लिया। जैसे ही मैंने उसके लंड को अपने मुंह में लिया। वह कहने लगा तुम तो बड़े अच्छे से कर रही हो थोड़ा और अंदर लो। मैंने भी उसको लंड को पूरे अपने गले मे ले लिया।


जैसे-जैसे मैं अंदर बाहर करती जाती उसको मजा आता। वह कहता बहुत अच्छे से कर रही हो तुम अब उसके बाद उसने मुझे खड़ा किया और मेरी ब्रा को खोलते हुए। मेरे स्तनों को अपने हाथों से दबाने लगा। पहले वह धीरे धीरे दबा रहा था। किंतु अब उसने काफी तेज दबाना शुरु कर दिया। अब अपने मुंह में भी मेरे स्तनों को ले लिया और उसे चूसने लगा। धीरे-धीरे वह मेरे चूचो को चूसता तो मुझे गुदगुदी सी होती और मुझे अच्छा महसूस होने लगता। अब उसने मेरे चूचो को पूरे अपने मुंह में समा लिया था और उसको अच्छे से चूसने लगा था।


यह देखकर  मुझे अच्छा लग रहा था और अंदर से अच्छी फीलिंग आ रही थी। उसने मेरे निप्पल पर दांत भी काट दिए थे। जिससे मुझे सेक्स की मांग मेरी बढ़ गई थी। मैंने अपनी योनि में उंगली लगा कर उसे रगड़ना शुरू कर दिया।  जैसे-जैसे मेरा सेक्स की भूख बढ़ती जाती वैसे ही मुझे और अच्छा लगता जाता। वह मेरे स्तनों का  अच्छे से रसपान कर रहा था। उसके बाद उसने मुझे जमीन पर ही लेटा दिया और मेरी पैंटी उतार दी। जैसे ही उसने मेरी पैंटी उतारी उसके बाद उसने अपने मुंह में मेरी योनि को लेते हुए। मेरी योनि के ऊपरी हिस्से को दबा लिया। अब उसने मुझे उल्टा कर कर मेरी गांड को भी चाटने लगा वह मेरे दोनों तरफ चाटता कभी आगे कभी पीछे मुझे इससे अच्छा लगने लगा था। अब उसने धीरे से मुझे उठाकर थोड़ा सा किनारे पर कर दिया।


अब वह मेरे ऊपर लेट गया और जैसे ही वह मेरे ऊपर लेटा तो उसने अपने लंड को मेरी योनि में धीरे धीरे डालना शुरू किया। क्योंकि मेरी योनि गीली हो चुकी थी इस वजह से उसे डालने में कोई परेशानी नहीं हुई। वह पूरा अंदर तक चला गया मानो ऐसा लगा जैसे दीवार में उसने सटा दिया हो  उसने अपनी स्पीड पकड़ी और काफी तेज तेज करने लगा मेरे स्तन और तेज हिलने लगे। वह इतनी तेज हिल रहे थे जैसे मानो भूकंप के झटके आ रहे हो। उसने 10 मिनट तक किया उसके बाद मेरी योनि इतनी गरम हो गई कि वो बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसका वीर्य पतन हो गया। जैसे ही उसका वीर्य गिरा। वह कहने लगा तुम वाकई में बहुत अच्छी हो। उसके बाद उसने दोबारा से थोड़ी देर बाद मेरे साथ सेक्स किया।


इस बार उसने मुझे इतनी जोर से धक्का मारा कि मेरे तो गले तक ही आ गया उसका लंड वह बड़ी तेजी से कर रहा था मानो जैसे कोई ट्रेन छूटने वाली हो लेकिन मुझे अच्छा लग रहा था। थोड़ी देर में उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया और उठाते उठाते ही वह मुझे चोदने लगा। अब मुझे बहुत ही अच्छा लगने लगा था। मानो ऐसा लग रहा था जैसे मेरी इच्छा पूर्ति हो गई हो। उसने धीरे से मुझे कहा मेरा गिरने वाला है। उसके बाद उसने मुझे लिटा दिया और मेरे पेट पर ही सारा वीर्य गिरा दिया। जिससे कि मेरा पुरा पेट गीला हो गया। उसके बाद मैंने कपड़े से साफ किया और अब हम दोनों रोज रात को ऐसा करने लगे।


हमने कुछ समय बाद शादी का फैसला कर लिया। हम पहले से ही जानते थे तो हमें एक दूसरे के बारे में जानने की जरूरत नहीं पड़ी। विवेक बहुत अच्छा लड़का था। अब हम ने शादी करने का फैसला किया मैंने यह बात अपने घरवालों को बताई तो उन्होंने इनकार कर दिया। और कहां पहले हम विवेक से मिलना चाहते हैं। उसके बाद हम फैसला करेंगे। एक दो महीने बाद जब मैं घर गई तो मैंने अपने मम्मी पापा को विवेक के बारे में बताया और उसे अपने घर वालों से मिलाया। मेरे पापा को विवेक बहुत अच्छा लगा। लेकिन मेरे मम्मी अभी भी दुविधा में थी क्योंकि विवेक का इस दुनिया में कोई नहीं था।


बचपन से उसके पिताजी ने उस को पाला और उसको पढ़ाया-लिखाया पर कुछ समय बाद उनका भी देहांत हो गया। अब वह बिल्कुल अकेला रह गया था। मैं और विवेक एक दूसरे को बहुत पसंद करते थे। मैने जैसे तैसे करके अपनी मां को शादी के लिए मनाया। मेरी मां विवेक से शादी कराने के लिए इसलिए तैयार नहीं थी। क्योंकि मेरी मां ने मेरे लिए कहीं और रिश्ता तय कर रखा था। लेकिन यह बात मुझे पता नहीं थी। मेरी मां ने यह बात मेरे पापा से की लेकिन मेरे पापा तो मेरे फैसले से खुश थे। लेकिन मां को मेरी बहुत चिंता थी।

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